ग्रहण दोष कुंडली की वह स्थिति है जिसमें सूर्य अथवा चंद्र राहु या केतु के साथ बैठे हों। इसे कुंडली में ग्रहण की स्थिति माना जाता है, और इसका निवारण ग्रहण दोष पूजन तथा रुद्राभिषेक से कराया जाता है।
जैसे आकाश में सूर्य या चंद्र पर राहु-केतु का प्रभाव ग्रहण कहलाता है, वैसे ही जन्मकुंडली में सूर्य या चंद्र का राहु अथवा केतु के साथ होना ग्रहण दोष कहा जाता है। मान्यता है कि इससे आत्मविश्वास और मानसिक स्थिरता प्रभावित होती है।
यह पृष्ठ पारंपरिक ज्योतिषीय मान्यताओं की जानकारी देता है। दोष की स्थिति और उसकी तीव्रता कुंडली देखकर ही तय होती है।
सूर्य के साथ राहु या केतु की स्थिति को सूर्य ग्रहण दोष कहा जाता है। परंपरा में इसे पिता से संबंध, आत्मविश्वास और सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़ा जाता है।
चंद्र के साथ राहु या केतु की स्थिति को चंद्र ग्रहण दोष कहा जाता है। इसे मन की स्थिरता, नींद और माता से संबंध से जोड़ा जाता है।
परंपरा में इसे मानसिक अस्थिरता, निर्णय लेने में कठिनाई, अकारण भय और बार-बार बनते-बिगड़ते कार्यों से जोड़ा जाता है।
ये संकेत अपने आप में प्रमाण नहीं हैं। किसी भी उपाय से पहले कुंडली दिखाना उचित रहता है, क्योंकि दोष की तीव्रता ग्रहों की डिग्री पर निर्भर मानी जाती है।
ग्रहण दोष पूजन के साथ रुद्राभिषेक और महामृत्युंजय जाप कराए जाते हैं। उज्जैन में यह महाकालेश्वर के सान्निध्य में कराया जाता है।
ग्रहण काल तथा अमावस्या को इसके लिए विशेष उपयुक्त माना जाता है।
पूजा आपके नाम और गोत्र से संकल्प लेकर की जाती है, इसलिए उज्जैन आना आवश्यक नहीं है।
आप वीडियो कॉल पर जुड़कर पूरी पूजा लाइव देख सकते हैं, और पूजा के बाद पूरी वीडियो रिकॉर्डिंग भी भेजी जाती है।
जन्मकुंडली में सूर्य अथवा चंद्र का राहु या केतु के साथ होना ग्रहण दोष कहा जाता है।
परंपरा में मानसिक अस्थिरता, निर्णय में कठिनाई, अकारण भय और बार-बार रुकते कार्य इससे जोड़े जाते हैं। निश्चय कुंडली देखकर होता है।
ग्रहण दोष पूजन के साथ रुद्राभिषेक और महामृत्युंजय जाप कराए जाते हैं।
ग्रहण काल और अमावस्या को विशेष उपयुक्त माना जाता है।
हाँ। संकल्प आपके नाम और गोत्र से लिया जाता है, और आप वीडियो कॉल पर पूजा देख सकते हैं।
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