पितृ दोष कुंडली की वह स्थिति मानी जाती है जिसमें पूर्वजों से जुड़ा अवरोध बताया जाता है — विशेषतः नवम भाव में सूर्य के साथ राहु या शनि की स्थिति। इसका निवारण पितृ दोष पूजन, तर्पण और श्राद्ध कर्म से किया जाता है, और उज्जैन इसके लिए प्रमुख स्थानों में गिना जाता है।
ज्योतिष में नवम भाव को पिता और पूर्वजों का भाव माना जाता है। जब इस भाव या सूर्य पर राहु, केतु या शनि का प्रभाव पड़ता है, तो उसे पितृ दोष कहा जाता है। मान्यता है कि इससे संतान, करियर और घर की शांति में बाधा अनुभव होती है।
यह पृष्ठ पारंपरिक ज्योतिषीय मान्यताओं की जानकारी देता है। दोष की स्थिति कुंडली देखकर ही तय होती है, और कौन सा कर्म उचित है यह पुजारी कुंडली के आधार पर बताते हैं।
परंपरा में इसे संतान प्राप्ति में बाधा, बार-बार अटकते कार्य, पारिवारिक कलह और स्वप्न में पूर्वजों के दिखने से जोड़ा जाता है।
इनमें से कोई भी लक्षण अपने आप में प्रमाण नहीं है। कुंडली देखे बिना यह तय नहीं किया जा सकता कि दोष है या नहीं — इसलिए किसी भी उपाय से पहले कुंडली दिखाना उचित रहता है।
उज्जैन क्षिप्रा नदी के तट पर स्थित है और महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का नगर है। पितृ कर्म, तर्पण और श्राद्ध के लिए यह स्थान परंपरा में विशेष माना जाता है।
यहाँ पितृ दोष पूजन के साथ नारायण बलि और त्रिपिंडी श्राद्ध भी कराए जाते हैं। कौन सा कर्म आवश्यक है, यह कुंडली और पारिवारिक स्थिति देखकर तय होता है।
पितृ पक्ष के सोलह दिन पितृ कर्म के लिए सबसे उपयुक्त माने जाते हैं। इस अवधि में उज्जैन में भीड़ अधिक रहती है और पुजारियों का समय पहले से भर जाता है।
यदि पितृ पक्ष में तिथि न मिले तो किसी भी माह की अमावस्या को यह कर्म कराया जा सकता है।
उज्जैन न आ सकने वाले भक्तों के लिए पूजा उनके नाम, गोत्र और पूर्वजों के नाम से संकल्प लेकर की जाती है।
आप वीडियो कॉल पर जुड़कर पूरी पूजा लाइव देख सकते हैं, और पूजा के बाद संपूर्ण अनुष्ठान की वीडियो रिकॉर्डिंग भी भेजी जाती है।
कुंडली के नवम भाव या सूर्य पर राहु, केतु अथवा शनि का प्रभाव पितृ दोष कहा जाता है। इसे पूर्वजों से जुड़ा अवरोध माना जाता है।
परंपरा में संतान संबंधी बाधा, बार-बार रुकते कार्य, घर में अशांति और स्वप्न में पूर्वजों का दिखना इससे जोड़े जाते हैं। निश्चय कुंडली देखकर ही होता है।
पितृ दोष पूजन, तर्पण और श्राद्ध कर्म से। स्थिति के अनुसार नारायण बलि या त्रिपिंडी श्राद्ध भी कराया जाता है।
पितृ पक्ष के सोलह दिन सर्वोत्तम माने जाते हैं। उसके अतिरिक्त किसी भी माह की अमावस्या उपयुक्त रहती है।
हाँ। पूजा आपके नाम और गोत्र से संकल्प लेकर की जाती है, और आप वीडियो कॉल पर जुड़कर देख सकते हैं। पूजा की वीडियो भी भेजी जाती है।
पितृ पक्ष में तिथियाँ जल्दी भर जाती हैं। पहले से तिथि सुरक्षित करें।